हल्द्वानी : मेरे मातम का कोई नाम नहीं..!

Haldwani Market closed on death of Transporter Prakesh pande

सुनो – सुनो …  हमारे शहर का आज बाज़ार बंद है शहर में मातम मनाया जा रहा है  वो शहर जिसे खड़ा होना था, साथ पहले  मरने के बाद अपनेपन का ढोल पीटता नज़र आ रहा है !!! हल्द्वानी #BolHaldwaniBol #HaldwaniLive परिवार अपने व्यापारी भाई प्रकाश पांडे जी निधन पर शोक प्रकट करता है हम सभी दुख़ इस घड़ी में पांडे जी के परिवार के साथ हैं…वो सिस्टम के मुंह पर बड़ा तामाचा मार के चला गया…वो राजनीति के मुंह पर क़ालिख़ पोत कर चला गया…वो हमारे अपने हल्द्वानी वालों को एक संदेश देकर चला गया … कि तुम सब वक्त पर साथ खड़े नहीं हुए…होते तो मुझे ये कदम उठाने की कभी ज़रूरत महसूस नहीं होती…

Haldwani Transporter prakesh pandey family condolence
                मेरे मातम का कोई नाम नहीं…!

आज जो तुम मेरी मौत पर मातम मना रहे हो…कल जो ग़र साथ खड़े हुए होते तो फिंज़ा कुछ और ही होती… अब रोओ मत … मेरी आवाज़ को बुलंद करो…मेरे जैसे न जाने कितने और कर्ज़दार अब भी अपने शहर में मौजूद हैं…राजनीति मौत पर सियासत करती है…मग़र जब कोई शख्स यूं ही अपनी जान गंवा बैठे, तो उसकी पत्नी…बच्चों और मां-बाप से पूछिए…कि दिल पर क्या गुज़रती है… 

Haldwani Transporter Prakash pandey eat poison in Uttarakhand Cabinet Minister Janta Darbar
उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री का जनता दरबार, ज़हर खाने का खुलासा कर चुका व्यापारी … सब आराम से बैठें हैं … सरकार हैं हम … कोई फ़र्क नहीं पड़ता…!

वो जनता दरबार या फिर यूं कहें…कि सत्ताशीन राजनेताओं का आम आदमी को इक्ट्ठा कर, उनकी चिट्ठी-पत्री लेकर उनके कामों को पूरा कराने का वादा करने का एक ड्रामा कैंप… ड्रामा कैंप इसलिए क्योंकि अगर वहां इंसानियत जिंदा होती, तो ज़हर खा चुके उस शख्स को जनता दरवार से किसी मुसीबत से बला टालने के लिए बाहर का रास्ता न दिखाया गया होता…

बल्कि राजनीति से ऊपर उठकर … इंसानियत को जिंदा रखते हुए, ज़हर खाने का खुलासा कर चुके, हल्द्वानी के व्यापारी प्रकांश पांडे को फौरन अस्पताल पहुंचाने के लिए…वहां मौजूद मंत्री बिना समय गंवाये, दौड़कर अपनी गाड़ी का इस्तेमाल करते…व्यापारी को फौरन अस्पताल तक ले जाते…लेकिन ऐसा नहीं हुआ…वक्त रहते अगर ज़हर खाये व्यापारी को फौरन प्रथामिक उपचार दिया गया होता तो शायद उसे बचाया जा सकता था…लेकिन इंसानिय जिंदा होती तब न…ये हम नहीं कह रहे…इस वीडियो को देखकर आपको खुद ही हक़ीकत का पता चल जायेगा …

ये…उस वीडियो की तस्वीरें वयां कर रहीं हैं…जिसमें व्यापारी प्रकाश पांडे उत्तराखंड के उस कठोर दिल मंत्री के जनता दरबार में…अपनी परेशानी का ख़त पेश कर उसे अपनी समस्याओं से रूबरू करवाते हैं…बावजूद इसके किसी के कानों पर कोई जूं तक नहीं रेंगती…न ही कोई चिंता और तनाव किसी के चेहरे पर दिखाई देता है…साफ है…आम जनता है मरती है तो मर जाये…हम तो सरकार हैं…मंत्री हैं…हमारा कौन कुछ बिगाड़ लेगा…

Uttarakhand Media tv channel taking byte after knowing a person had ate the poison
मीडिया :   हम सब इंसानियत खो चुके हैं … हमें सिर्फ मौत पर तमाशा दिखाना है … बेहद शर्मानाक तस्वीर

लेकिन उससे भी ज्यादा इंसानियत खो चुका हमारा अपंग मीडिया…वो मीडिया, जो हमेशा दूसरों के हक़ की आवाज़ उठाने के लिए जाना जाता है…वही Media ज़हर ख़ा चुके शख्स के मुंह पर अपने माइक की लोगो आई-डी ठूंसे उसकी मौत के पल का तमाशा अपने कैमरों में कैद करता रहा… किसी भी पत्रकार, रिपोर्टर, जर्नलिस्ट, कैमरामैन कहलवाने का शौक पाले हुए शख्स में इंसानियत दिखाई ही नहीं दी… लानत है ऐसी रिपोर्टिंग और पत्रकारिता पर… जो मौत का तामाशा बनाये … और इंसानियत को शर्मसार कर दे … तो वहीं शर्म आती है निम्न स्तर पर पहुंचती राजनीति पर…क्योंकि

ये वो नेता हैं जिन्हें आप और हम वोट देकर सत्ता पर काबिज़ करते हैं…और सत्ता हासिल होने के बाद इनके पैर ज़मीन पर न होकर हवा से बातें करने लगते हैं…इनके लिए एक व्यापारी का कर्ज़ से परेशान होना बहुत छोटा लगता है…इनके लिए जीएसटी और नोटबंदी के असर से किसी व्यापारी का व्यापार में घाटा होकर, तमाम लोगों का कर्ज़दार बन जाना…उसकी अपनी समस्या लगती है…इन नेताओं और इनसे जुड़े चिल्लर कार्यकर्ताओं का ये कहना, कि #GST / #जीएसटी और  #Notebandi  #नोटबंदी / #Demonetization से व्यापारी का कर्ज़ में डूबना उसकी अपनी परेशानी थी…चलो मान लिया, ये सारी परेशानी उस मौत के काल में समा चुके व्यापारी की थी…लेकिन ज़रा गौर से सोचिए, कि इसका ज़िम्मेदार कौन है…ज़रा गौर से सोचिए, कि आख़िर उत्तराखंड सरकार का मुखिया इस सब पर ख़ामोश क्यों है…आखिर उस व्यापारी की बात तमाम चिट्ठी पत्री के बाद भी, मुख्यमंत्री ने क्यों नहीं सुनी…क्यों उसे मिलने का वक्त नहीं दिया…

दरअसल ये सवाल सिर्फ व्यापारी पांडे का ही नहीं था, बल्कि सरकार में मौजूद तमाम विधायक और मंत्रियों का भी है…उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की तानाशाही कहें या फिर कुर्सी का रौब…या फिर सत्ता की हनक…तभी रात के 9 बजे के बाद…आप अपने ही वोटों से चुने विधायक और विधायक से मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल करने वाले शख्स से मिल तक नहीं सकते…बात यहीं पर खत्म होती तो ग़नीमत थी…शर्मनाक तो उस पूर्व मुख्यमंत्री के लिए वो क्षण रहे …जिसे हाल ही में एक बड़े राज्य के चुनाव में केंद्र ने बड़ी ज़िम्मेदारी दी थी…और हमारे राज्य के सीएम ने उन्हें 40 मिनट तक इंतज़ार करवा कर ये कहलवा दिया… कि साहेब सोने चले गये हैं…इससे बड़ी शर्मिंदगी हमारे और आपके लिए क्या होगी…

कांग्रेस ने शुरू की मौत पर सियासत
उत्तराखंड कांग्रेस का व्यापारी की मौत पर सरकार के ख़िलाफ़ प्रर्दशन : ग़ौर से देखिए प्रर्दशनकारियों के चेहरे … हर-तरफ मुस्कुराते चेहरे दिखेंगे … इसे कहते हैं “मौत पर सियासत”

विपक्ष भी अब जाग चुका…क्योंकि मौत पर सियासत का मुद्दा हर कोई भुना लेना चाहता है…अगर विपक्ष को इतनी ही चिंता थी तो मौत से पहले सरकार को घेरकर सियासत करते…अच्छा लगता…लेकिन वो कहते हैं…जब विपक्ष अपना दम तोड़ दे तो सरकारें मनमौजी हो जाती हैं…वही इस वक्त हो रहा है…

व्यापारी प्रकाश पांडे की मौत के बाद अब सबको नज़र ने लगा कि व्य्पारी की माली हालात बेहद ख़राब है…शहर की विधायक भी अब जाग चुकीं हैं…शासन से संबिदा पर मरहूम पांडे जी की पत्नी को नौकरी दिलाने की दरियादिली दिखाई…साथ ही 12 लाख रुपए की आर्थिक सहायता भी सरकार देने जा रही है…जिसमें से 2 लाख रुपए शायद दे भी दिये गये हैं…बाकि का बकाया एक महीने में परिवार को मिल जायेगा…यानी एक इंसान की मौत की कीमत और उसकी बोली —लग चुकी है…सौदा हो चुका है…लेकिन यही सौदा वक्त रहते व्यापारी पांडे के साथ कर लिया गया होता तो शायद वो अपने परिवार के साथ होते…लेकिन अगर ऐसा पांडे जी की मौत से पहले हो जाता तो ये राजनेता अपनी राजनीति को कैसे चमकाते…अब सब बहती गंगा में हाथ धोकर पुण्य कमा लेना चाहते हैं… अगर यही बाज़ार पहले उस व्यापारी के लिए बंद कर उसकी आवाज़ को बुलंद करते तो सोई सरकार  को नींद से जागना पड़ता… लेकिन सारा खेल तो राजनीति का है… क्योंकि मेरे मातम का कोई नाम  नहीं…                         

    

 

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2 thoughts on “हल्द्वानी : मेरे मातम का कोई नाम नहीं..!

  • January 10, 2018 at 7:40 pm
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    व्यापारी की मौत की घटना दुखद है और इससे भी ज्यादा दुखद है सरकार में बैठे संवेदनहीन लोग ।

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