उत्तराखंड की विकलांग सरकार , रौंगटे खड़े कर देने वाली हक़ीक़त !

Uttarakhand Disable government and system
उत्तराखंड की विकलांग सरकार, 1200 रुपए भी नहीं सरकार के पास

उत्तराखंड #BolUttarakhandBol सरकार ये क्या ग़जब कर रहे हैं, क्या कोई राजा अपनी ग़रीब प्रजा के साथ इतना अन्याय कर सकता है? क्या कोई राजा अपनी गरीब प्रजा के साथ इतना निष्ठुर हो सकता है? क्या कोई राजा अपनी गरीब प्रजा के साथ इतना ज़ुल्मी हो सकता है?  “सरकार” कुछ महीने पहले राज्य का एक व्यापारी आप और आपकी पार्टी पर संगीन आरोप लगाकर आपके मंत्री के दरबार में ही ज़हर खाकर खुदकुशी कर चुका है। लेकिन लगता है “सरकार” आप वाकई पत्थर के बने हैं। क्योंकि जिस Disable दिव्यांग शख्स ने आप और आपके सिपाहसालारों पर गंभीर और बेहद गैरज़िम्मेदाराना आरोप लगाये हैं वो वाकई रौंगटे खड़े कर देने वाले हैं। “सरकार” कसम से आपको तो भगवान भी मॉफ़ नहीं करेगा।

आज की ये स्टोरी केवल एक कहानी नहीं है, बल्कि हमारे अपने उत्तराखंड राज्य के उस गरीब लाचार शख्स की मुंह जुबानी है, जिसे न सिर्फ राज्य के ही एक वरिष्ठ पत्रकार ने सोशल मीडिया पर साझा किया बल्कि उसके दर्द को अपना दर्द समझकर सरकार से चेत जाने की भी अपील की।

Sr. Journalist Chetan Gurung
साभार , चेतन गुरंग , वरिष्ठ-पत्रकार की फेसबुक वॉल से

राज्य के वरिष्ठ पत्रकार चेतन गुरंग की फेसबुक बॉल से ये ह़कीकत आप सब से साझा कर रहा हूं। वाक्या शनिवार देर शाम का है। अंधेरा घिर चुका था। होली के बाद भी होली के रंगों से रंगरेज राज्य के लोग अपने अपने घरों में होली का खुमार उतार रहे थे। शायद सरकार भी। लेकिन उस वक्त वरिष्ठ पत्रकार चेतन गुरंग अपने काम से निबटकर अपनी गाड़ी से कहीं जा रहे थे। चेतन कैंट गढ़ी पुलिस स्टेशन के पास से गुज़रे ही थे कि उन्हें एक दिव्यांग शख्स को देखा। चेतन के लेख के मुताबिक वो शख्स दोनों हाथों से तकरीबन दिव्यांग था। पहाड़ का रहने वाला ये दिव्यांग शख्स सड़क पर खड़े होकर बल्लूपुर चौक जाने वाले हर वाहन से लिफ्ट मांगने की कोशिश कर रहा था। लेकिन आज के ज़माने में भलाई कहां।

जींस टी-शर्ट पहने कोई युवती होती तो यकीन मानिए एक नहीं दस गाडियां कताक से लिफ्ट देने के लिए रुक जातीं। खैर चेतन की नज़र उस दिव्यांग शख्स पर अचानक जा टिकी। कुछ देर तक चेतन उस शख्स को देखते रहे, लेकिन दयालु ह्र्दय वाले हमारे वरिष्ठ साथी चेतन गुरंग से उस दिव्यांग पहाड़ी भाई का दुख देखा नहीं गया। चेतन अब दिव्यांग शक्स के पास पहुंच चुके थे। और उससे बात करने के बाद उसे अपनी गाड़ी में लिफ्ट दी। चेतन का इतना कहना भर था, मानों किससी अंधे शख्स को आंखे मिल गईं हो। फौरन दिव्यांग शख्स चेतन के पैरों में पड़ गया। और बातचीत के दौरान इस दिव्यांग शख्स ने जो खुलासे किये, यकीन मानिए उसने हमारे सारे सिस्टम से लेकर “सरकार”  और उनके सिपाहसालारों की कलई खोलकर रख दी।

लिफ्ट लेने के लिए पिछले कई घंटे से जद्दोज़हद कर रहा दोनों हाथों से दिव्यांग शख्स चेतन को एक एक हर्फ़ वयां कर रहा था, और चेतन उसे गंभीरता से सुन रहे थे। दिव्यांग ने बताया कि वो राज्य के मुखिया यानी “सरकार” के यहां होकर आ रहा था। लेकिन जिस सरकार पर वो बेहद भरोसाकर उनके आवास पर पहुंचा था, वो भरोसा अब तार-तार हो चुका था। वो ही भरोसा, जब उस शख्स ने अपने दोनों हाथों के न होते हुए भी इस सरकार को चुनने में दिखाया था।

दिव्यांग की कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ रही थी, यकीन मानिए चेतन का दिल पसीजने के साथ साथ सरकार और सिस्टम दोनों पर ग-बबूला हो रहा था। ठीक उतना ही जितना मेरा हुआ। विरिष्ठ पत्रकार चेतन गुरंग की फेसबुक वॉल पर इस हकीक़त को पढ़कर।

दिव्यांग ने चेतन को बताया कि उनका बेटा बहुत बीमार है। जिसे पहले दून अस्पताल ( अब मेडिकल कॉलेज ) में दिखाया। जहां से उनके बेटे को हिमालयन इंस्टीट्यूट जौली ग्रांट रेफर कर दिया गया। कई दिनों तक उनके बेटे का इलाज Himalayan Institute में चलता रहा। इस पूरे इलाज पर आर्थिक तौर पर कमजोर इस दिव्यांग शख्स के करीब 70 हज़ार रुपए खर्च हो गये। बावजूद इसके उनका बेटा स्वस्थ नहीं हुआ। आर्थिक रूप से बुरी तरह  अपने राज्य के इस दिव्यांग शख्स पर मानों पहाड़ टूट पड़ा था। उधार लिए करीब 70 हज़ार खर्च हो चुके थे। बेटा भी ठीक नहीं हुआ था। और अब आगे का इलाज़ कराने के लिए उसके पास फूटी कौढ़ी भी नहीं बची थी। लिहाज़ा पैसों की व्यवस्था न होने के चलते हिमालयन इंस्टीट्यूट के डॉक्टरों ने इलाज़ करने से हाथ खड़े कर दिये। और दिव्यांग के बेटे को एम्स ऋषिकेश रेफर कर दिया।

जेब से पूरी तरह खाली हो चुका हमारे अपने उत्तराखंड राज्य का ये दिव्यांग शख्स अपने बेटे को बचाने की खातिर Aiims Rishikesh जा पहुंचा। बाप जो ठहरा। आखिरी सांस तक अपनी औलाद को बचाने के लिए कुछ भी करता।

लिहाज़ा अब दोनों हाथों से दिव्यांग को अब उम्मीद की एक ही किरण नज़र आ रही थी। और वो उम्मीद की किरण थी “सरकार” । दिव्यांग को पूरा भरोसा था, कि सरकार के पास जाकर उसे अपने बेटे के इलाज़ कराने के लिए कुछ आर्थिक मदद ज़रूर मिलेगी। लिहाज़ा बिना वक्त गंवाये दिव्यांग किसी तरह लोगों से लिफ्ट मांगता देहरादून “SARKAR” के आलीशान आवास पर जा पहुंचा। दिव्यांग को भरोसा था कि उसे सरकारी फंड या सरकार के विवेकाधीन कोष से 10-20 हज़ार की र्थिक सहायता तो ज़रूर मिल जायेगी। लेकिन इस शख्स को शायद याद नहीं रहा, कि गरीबी उसके साथ चल रही थी। वो ही गरीबी जिससे बड़े-बड़े बंगलों और कोठियों में रहने वाले सरकार जैसे लोग दस फीट की दूरी से ही हाथ जोड़ लिया करते हैं।

लिहाज़ा एक बड़ी म्मीद के साथ दिव्यांग सरकार के आवास पर पहुंच चुका था, लेकिन सरका से उसकी मुलाकात नहीं हो सकी। होती भी तो कैसे ? जो सरकार अपनी ही पार्टी के एक वरिष्ठ पूर्व मुख्यमंत्री को इंतज़ार करवाने के बाद कहलवा दे कि सरकार सोने चले गये। तो फिर आर्थिकतौर पपर तूट चुके इस दिव्यांग शख्स की बिसात ही क्या थी!

बहराहाल सरकार की जगह दिव्यांग की मुलाकात विशेष कार्याधिकारी धीरेंद्र पवांर से हुई। दिव्यांग ने उन्हें अपनी लाचारी और बेबसी की पूरी दास्तां सुनाई। लेकिन सरकार के सिपाहसालार का दिल कतई नहीं पसीजा। और दिव्यांग से दो-टूक शब्दों में बोल दिया कि सरकार के पास बजट नहीं उनके विवेकाधीन कोष में।

दिव्यांग सरकार के विशेष कार्याधिकारी धीरेंद्र पवार साहेब की जी-तोड़ मिन्नतें करता रहा। लेकिन पवार नाम का ये शख्स ठहरा सरकार का सिपाहसालार, कैसे पिघल जाता। उम्मीद बुररी तरह टूट चुकी थी। वक्त पर इलाज न मिले के चलते मन में बेटे को खोने का ख्याल बार-बार दिव्यांग के दिलो-दिमाग में  बार-बार आ रहा था। बेबस और बिखरे हुए मन से दिव्यांग ने पवांर नाम के इस कठोर दिल शख्स से एक और फरियाद कर दी।

दिव्यांग ने पवार साहेब से देहरादून से Rishikesh और वहां से अपने गांव जाने का किराये लायक करीब 1200 रुपयों की मदद की गुहार कर दी। लेकिन बेहरहम सरकार के इस मुलाज़िम ने इसे भी ठुकरा दिया।

दिव्यांग की दर्दभरी दास्तां, चेतन की कार के साथ-साथ धीरे-धीरे बढ़ रही थी। दिव्यांग ने चेतन को बताया कि अपने Uttarakhand के ही चन्द्रबदनी गांव में उसकी पत्नी रहती है, और वो भी दोनों पैरों से बेबस है। ये सब सुनकर चेतन मन ही मन बेहद परेशान हो उठे। चेतन ने उपना बटुआ निकाला और जो भी उसमें था नमें से कुछ आर्थिक सहायता के तौर पर घर पहुंचने की मदद के तौर दिव्यां के हाथों में रख दिये।

गीरी, लाचारी और बेबसी की इस दर्दनाक दास्तां को सुनते सुनते चेतन इस दिव्यांग शख्स से नाम पूछना ही भूल चुके थे। चेतन की कार धीरे-धीरे बढ़ रही थी। और एक ऐसी जगह पर लाकर चेतन उस शख्स को उतारा जहां से इस दिव्यांग शख्स को ऋषिकेश तक जाने की कोई सवारी मिल सके। चेतन जब से उतारा तो इस दिव्यांग शख्स ने चेतन को ठेर सारा आर्शिवाद देते हुए अपना नाम भी बता दिया। दिव्यांग शख्स का नाम है, विनोद प्रसाद चमोली

चेतन इस दिव्यांग शख्स को छोड़कर अब घर पहुंच चुके थे। और बिना खाना खाये ही बेहद दुखी मन से अपने सिस्टम पर बैठ गये। बार-बार चेतन के दिलो-दमाग पर दिव्यांग शख्स का बेबस चेहरा घूम रहा था। चेतन ने अपना फेसबुक अकांउट लॉग-इन किया। और जो कुछ लिखा। और खुद ही पढ़ लीजिए।

Senior Journalist Chetan Gurung , Dehradun
साभार – वरिष्ठ पत्रकार “चेतन-गुरंग” की फेसबुक वॉल से

सच में बेहद शर्म आती है, कि आप हमारे राज्य के मुखिया हैं। बेहद कोफ्त होती है “सरकार” कि आपके सिपाहसालार इतने निष्ठुर हैं। बेहद  रंज होता “सरकार” कि लोगों ने आपको चुना।

विनोद प्रसाद चमोली नाम का दिव्यांग जो दोनों हाथों से बेबस और जिसकी पत्नी दोनों पैरों से दिव्यांग हो, उस शख्स की मदद वो भी उनके बेटे की बीमारी के लिए आर्थिक सहायता के तौर पर। इस सरकार के पास नहीं। ऐसी सरकार से किसी भी तरह की उम्मीद करना बेमानी लगता है। क्योंकि दिव्यांग इतना खुद्दा था कि उसने पैसों की मदद के लिए हाथ तब उठाये जब उसके बेटे की जिंदगी और मौत का सवाल उसके सामने आ खड़ा हुआ। चाहता तो सरकार से अपने और पत्नी के दिव्यांग होने के तौर भी मदद की गुहार लगा सकता था। नतमस्तक हूं ऐसे पिता पर, जो दिव्यांग होते हुए भी अपने बेटे के इलाज़ के लिए जद्दोज़हद कर रहा है। और लानत देता हूं “सरकार” आपको जो सक्षम होते हुए भी अपनी प्रजा को मामूली सी मदद करने के काबिल तक नहीं। याद रखना “SARKAR” वक्त की मार जब पढ़ती है तो आवाज़ नहीं होती।  चेतन ने उस दिव्यांग शख्स की मदद करके जो तमाचा “सरकार” आपके मुंह और सारे सिस्टम पर मारा है, उसकी गूंज आपको आने वाले वक्त में ज़रूर सुनाई देगी।                                       

              

                     

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